05/02/2020
क़ाबिले ग़ौर है। यह हदीस कि: "जब इमामे ज़माना तशरीफ़ लायेंगे तो 70 हज़ार उलोमा की गर्दनें काटेंगें।!"
हमारे नबी (स) कायनात के लिए रहमत बना कर भेजे गये हैं।
नबी (स) के नायब भी रहमत होने चाहिएं। जो यक़ीनन रहमत हैं।
11 इमामों ने दुश्मनों तक को माफ़ किया और किसी की गर्दन न उतारी। और हमारे इन आइम्मा ने उलोमा पर ख़ास इनायात रखी हैं।
तो फ़िर यह कैसे मुमकिन है कि बारहवें इमाम (अ) आ कर उलोमा की गर्दनें उतारेंगे। ?!
मुहद्देसीन और मुहक़्क़ेक़ीन ने ऐसी हदीसों की पड़ताल में पाया है। कि इस तरह की हदीसे ज़ईफ़ हैं।
ऐसी हदीसों का प्रचार करके इमामे ज़माना (अ) को रहमत, हिदायत, लुत्फ़, मुहब्बत, इनायात, मेहरबान, और माफ़ करने वाले के बजाय ख़ून ख़राबा करने वाले के तौर पर पेश किया जाता है।
दूसरे यह कि उलोमा जो ग़ैबते इमाम (अ) में दीन के मुहाफ़िज़ होते हैं और दीन के लिए अपनी जिंदगी वक़्फ़ कर देते हैं। उन्हें इस ख़िदमत का यह सिला हरगिज़ नहीं दिया जा सकता कि इमाम ही उनकी गर्दनें उतार लें।!?
बाज़ लोग तावील करते हैं कि इस से मुराद " उलोमा ए सू" हैं।
अगर ऐसा होता तो हदीस में "उलोमा" मुतलक़ न आता बल्कि "सू" की क़ैद लगाई जाती। जो कि नहीं लगाई गई।